हस्त मुद्रा हमारी संस्कृति का एक मजबूत हिस्सा है। ये हमारे ऋषि मुनियो दवारा हज़ारो साल पहले खोज की गई थी। जो की हमारे शरीर और मन को स्वस्थ्य रखने के साथ-साथ और मानसिक शांति भी प्रदान करते है। इन मुद्राओ को प्रतिदिन उपयोग में लाकर वे स्वस्थ जीवन जीते आये है । यह शरीर पंचतत्वों से मिलकर बना है। पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि। और हमारे शरीर में जब भी इन तत्वों की कमी होती है या फिर इन तत्वों का असंतुलन होता है तो शरीर में रोग उत्पन्न होने लगते है। यदि हम इन पंचतत्वों का संतुलन बनाये रखे तो हमारा शरीर रोगो से मुक्त रहेगा।
हस्त मुद्रा एक चिकित्सक पद्धत्ति है इस पद्धति में हम अपनी पांचो अंगुलियों का उपयोग करते है। अंगूठे की पोर से हम चारो अंगुलियों को स्पर्श करते है। इन स्पर्शो से हमारे शरीर में अलग अलग प्रकार के प्रभाव पड़ते है। जबकि बहुत सी मुद्राये हाथो के कलाई को मोड़ कर भी की जाती है। हमारे भारतीय संस्कृति में नृत्यों के माध्यम से बहतु सी मुद्राओ को प्रस्तुत किया जाता है। जहाँ हर मुद्रा का एक अपना विशेष महत्व होता है। ये मुद्राये हमारे शरीर की हज़ारो नसों और नाड़ियों को प्रभावित करती है। जिनका हमारे शरीर पर अच्छा प्रभाव होता है।
ये मुद्राये तुरंत ही हमारे शरीर में असर दिखाना शुरू करती है। जिन हाथो में ये मुद्राये बनती है उसके विपरीत ही ये मुद्राये अपना कार्य करने लगती है। इन सब मुद्राओ को करते समय हमे , पद्मासन , व्रजासन ,सुखासन का प्रयोग करना चाहिए। इन मुद्राओ को हमे लगभग 15 से 20 मिनट तक आकर सकते है। दिन में 2 बार भी इस मुद्रा को कर सकते है।
मुद्रा करते समय जिन अँगुलियों का उपयोग न हो उसे हम सीधे रखे। वैसे तो मुद्राये बहुत प्रकार की होती है लेकिन हम यहाँ पर कुछ विशेष मुद्रा के बारे में आपको बताने जा रहे है।
हस्त मुद्रा के प्रकार :-
1) ज्ञान मुद्रा
2) वायु मुद्रा
3) आकाश मुद्रा
4) शून्य मुद्रा
5) पृथ्वी मुद्रा
6) सूर्य मुद्रा
7) वरुण मुद्रा
8) अपान मुद्रा
9) अपान वायु या ह्रदय रोग मुद्रा
10)प्राण मुद्रा
11) लिंग मुद्रा
ज्ञान मुद्रा

विधि – अंगूठे और तर्जनी अंगुली के सिरे को आपस में मिलाये। और शेष तीनो अंगुली सीधे रखे। इस विधि को कम से कम आप 10-15 मिनट या 20 मिनट तक भी कर सकते है।
लाभ – इस मुद्रा को करने से स्मरण शक्ति का विकास होता है। बुद्धि तीव्र होती है।
सिरदर्द की बीमारी दूर होती है। थकान, अनिद्रा की समस्या ठीक होती है।
स्वभाव में परिवर्तन, अध्यात्म शक्ति का विकास होता है, मानसिक शांति मिलती है। क्रोध शांत होता है।
सावधानी – सात्विक और सदा भोजन ही करे। सुपारी, पान मशालों के उपयोग से बचे।
बाहरी और पेय पदार्थो का उपयोग न करे।
वायु मुद्रा

विधि – तर्जनी अंगुली को मोड़कर अंगूठे के पोर से तर्जनी अंगुली के नाख़ून के निचे वाले पोर को स्पर्श करे। इस विधि को आप 10 से 15 मिनट कर सकते है।
लाभ – शरीर बेचैनी, दर्द को कम करती है। वायु तत्वों की कमी को पूरा करते है।
साइटिका, लकवा, पीठ दर्द, गठिया, घुटने के दर्द को ठीक करते है।
गर्दन के दर्द , रीढ़ की दर्द, पार्किंसन नामक बीमारी में लाभ मिलता है।
हार्मोन्स रिलेटेड समस्या को ठीक करता है।
नोट :-इस मुद्रा के साथ साथ आप प्राण- मुद्रा का भी प्रयोग कर सकते है।
सावधानी – लाभ हो जाने तक ही इस मुद्रा का अभ्यास करे।
आकाश मुद्रा

विधि – इस मुद्रा के अभ्यास के लिए आप मध्यमा अंगुली के पोर से अंगूठे के अग्रभाग से स्पर्श करे। बाकि शेष अंगुलियों को आप सीधा रखे।
लाभ – कान के सब प्रकार के रोग जैसे बहरापन आदि रोगो को ठीक करता है।
कमजोर हड्डियों से जुड़े समस्या ,हृदय रोग को भी ठीक करता है।
कब्ज पाचन सम्बन्धी समस्या में लाभ पहुँचता है।
शरीर को अंदर से सफाई का काम करता है।
सावधानी – चलते फिरते समय या भोजन करते समय इस मुद्रा को न करे। लाभ पहुंचने के बाद इस मुद्रा को न करे।इस मुद्रा को आप सुबह या शाम में कर सकते है।
शून्य मुद्रा

विधि – मध्यमा अंगुली को मोड़ कर अंगूठे के निचले हिस्से से स्पर्श करे। इस प्रकार मध्यमा अंगुली के अंगूठे से दबा रहेगा। अगर अंगुली में हल्की-हल्की दर्द हो तो इस अभ्यास को धीरे-धीरे करे।
लाभ – किसी भी प्रकार के दर्द जैसे सीने में दर्द, हाथ-पैर में दर्द से रहत पाने के लिए इस मुद्रा को आप कर सकते है।
साथ ही कान के रोग बहरापन जैसे बीमारी में धीरे-धीरे शब्द सुनाई देने लगता है।
मसूढ़ों को मजबूती प्रदान करता है तथा गले के रोग, थायराइड में भी लाभ पहुंचते है।
पृथ्वी मुद्रा

विधि – अनामिका (रिंग फिंगर) को मोड़ कर आप अंगूठे से स्पर्श करे। इस मुद्रा को आप शुरवात में 10-20 मिनट करे फिर धीरे से 40 से 45 भी कर सकते है।
लाभ- इस मुद्रा को करने से शरीर में लचीलापन, स्फूर्ति और तेजस्विता, शक्ति का संचार होता है।थकान दूर होती है।
यह मुद्रा दुबले पतले व्यक्ति को मोटा करने के लिए बहुत ही फायदेमंद है।
सात्विक गुण का विकास और स्मृति शक्ति का विकास होता है। याददाश्त बढ़ती है। दिमाग शांत होता है।
विटामिन्स की कमी को पूरा करती है।
पृथ्वी मुद्रा करने से महिलाओ की खूबसूरती बढ़ती है। स्किन और पुरे शरीर में चमक आती है।
जिन लोगो को भोजन पचने में दिक्कत होती है या गैस की प्रॉब्लम या पेट से रिलेटेड कोई भी दिक्कत। इस मुद्रा को वज्रासन में करना से बहुत लाभ मिलता है।
सावधानी – वैसे पृथ्वी मुद्रा आप वज्रासन में करना जायदा लाभकारी होता है। इस मुद्रा को आप सुबह या शाम कभी भी कर सकते है।
सूर्य मुद्रा

विधि – अनामिका अंगुली को मोड़ कर अंगूठे के पोर से अनामिका अंगुली को स्पर्श करे।
लाभ – वजन को काम करता है। मोटापा कम होता है। शरीर में संतुलन बनाये रखता है।
यह मुद्रा केलोस्ट्रोल लेवल को कम करता है।
शरीर में गर्मी पैदा करता है यह मुद्रा ठण्ड के दिनों के लिए बहुत उपयोगी है।
जिन स्त्रियों को प्रसव के दौरान मोटपा बढ़ जाता है। उनके लिए यह मुद्रा बहुत लाभकारी होगा। इस मुद्रा को अगर वे प्रसव के बाद डेली 20 से 30 मिनट करे तो उनका वजन कम हो जायगा। यह मुद्रा जिन्हे शुगर है उनके लिए भी बहुत फायदेमंद है। साथ ही यह मुद्रा लिवर और पेट की अन्य समस्याओ को भी ठीक करती है।
सावधानी – अधिक कमजोरी की अवस्था में सूर्य मुद्रा नहीं करनी चाहिए।
यदि आप इस मुद्रा को गर्मी में करते है तो इस मुद्रा को करना से पहले आप 1 गिलास पानी पी सकते है।
वरुण मुद्रा

विधि – कनिष्ठा अंगुली को अंगूठे के पोर से स्पर्श करे। यह मुद्रा जिनके शरीर से बहुत अधिक पसीना निकलता हो उन्हें यह मुद्रा नहीं करनी चाहिए।
लाभ – यह मुद्रा जल तत्वों की कमी को पूरा करता है।
जल तत्व की कमी से उत्पन्न चर्म रोग, रक्त विकार जैसे समस्याओं को दूर करता है।
शरीर में रूखे पन (ड्राई स्किन) को दूर कर चिकनाई बढ़ती है। स्किन चमकदार, मुलायम होती है।
कील मुहसो, दाग धब्बो के लिए भी बहुत फायदेमंद है।
शरीर से दुर्गन्ध की समस्या, स्वाद न आने की समस्या भी ठीक होती है।
सावधानी – कफ प्रकृति वाले इस मुद्रा को अधिक ना करे।
अपान मुद्रा

विधि– मध्यमा और अनामिका अंगुली को एक साथ अंगूठे के अग्र भाग से स्पर्श करे।
लाभ – कब्ज दूर होती है, मल दोष नष्ट होता है।
बबासीर जैसे समस्याओ में काफी लाभदयक होती है।
शुगर, मूत्रोरोध, गुर्दो की समस्याओ , वायु विकार ,और दांतो के दोष दूर होते है।
पेट के लिए यह बहुत उपयोगी है। साथ ही हृदय रोगो में भी काफी फायदा होता है
साथ यह पसीना भी खूब लाती है।
सावधानी – इस मुद्रा से मूत्र अधिक होता है।
अपान वायु मुद्रा / ह्रदय- रोग मुद्रा

विधि – तर्जनी अंगुली के पोर को मूल (अंदर ) से स्पर्श करे। फिर आप मध्यमा और अनामिका अंगुलियों को अंगूठे के पोर से स्पर्श करे।
लाभ – जिनका दिल कमजोर है। जिन्हे दिल का दौरा पड़ता है वे इस मुद्रा को कर सकते है। जो की काफी लाभदायक होगा।
ब्लड प्रेस्सर की समस्या होतो आप ऐसे कर सकते है। यदि आपको सीढ़ी चढ़ने के बाद हाफने की दिक्कत होती है तो आप सीढ़ी चढ़ने से पहले 5 से 7 मिनट इस मुद्रा को कर सकते है।
सिर-दर्द होने पर या दमे की शिकायत होने पर भी यह मुद्रा काफी लाभ पहुँचती है।
पेट में गैस की प्रॉब्लम या पेट से रिलेटेड प्रॉब्लम होने पर यह मुद्रा काफी लाभदायक होता है।
ह्रदय मुद्रा का सम्बन्ध मध्यमा और अनामिका अंगुली से होता है।
सावधानी – ह्रदय का दौरा आने पर इस मुद्रा को कर सकते है। यदि आप गंभीर स्थिति में हो तब भी आप इस मुद्रा को कर सकते है।
प्राण मुद्रा

विधि– कनिष्ठक और अनामिका अंगुली के पोर (किनारे) से अंगूठे को स्पर्श करे।
लाभ – आँखों से जुड़े समस्या को दूर करती है आँखों की रौशनी बढ़ती है।
शरीर की रोग – प्रतिरोधक छमता बढ़ती है। विटामिनस की कमी को दूर करती है।थकान कम लगता है।
शरीर की दुर्बलता को दूर करती है साथ है मन को शांति प्रदान करती है।
शरीर आँखों और स्किन को तकलीफो को दूर कर चमकदार बनती है।
लम्बे समय तक उपवास रहने के बाद आप इस मुद्रा को करने से भूख-प्यास की समस्या नहीं होती।
इस मुद्रा को आप ज्ञान मुद्रा के साथ कर सकते है।
लिंग मुद्रा

विधि – इस मुद्रा में आपको दोनों हाथो को आपस में मिलाकर एक ग्रीप जैसा बनाना है। फिर दोनों में से कोई भी एक अंगूठा सीधा रखे और दूसरे अंगूठे को पीछे से लेकर घेर दे।
लाभ – यह मुद्रा शरीर में गर्मी पैदा करती है।
सर्दी बुखार जैसा होने पे आप इस मुद्रा को कर सकते है। इससे कफ भी सुख जाता है।
इसके आलवा इस मुद्रा को आप लकवा, दमा, साइनस, लो ब्लड प्रेस्सर में भी काफी लाभदयाक है।
इस मुद्रा को करने से शरीर में कैलोरी बनती होती है। जिससे मोटापा कम होता है।
इस मुद्रा को करने से यदि आपकी नाभि खिसक जाये तो वह अपने स्थान पे आजाती है।
सावधानी – यदि आप इस मुद्रा को करे तो आप काफी मात्रा में दूध, फल, जूस, घी का सेवन करना चाहिए।